Sunday, 19 January 2020

पारखी नजर



वो पारखी नजर लाऊं कहां से मैं,
जो समझ सके इन्सानों को।

जिसने भी अच्छा बोला, सच्चे लगे मुझको,
विश्वास किया तो , नासमझ समझने लगे,
मीठा बनकर, मीठा बोलते हैं जो,
जहर दिलों में सदा संजोते हैं वो,
छल-कपट ही उनका हिस्सा होता है,
ये किसी ने समझाया था मुझे, पर

वो पारखी नजर लाऊं कहां से मैं,
जो समझ सके इन्सानों को

हर रिश्ते निभाए अपना मानकर
पर सब बेमानी थे, बेमतलब के थे
मेरे तस्वर में शायद वो सब शामिल न थे
इसलिए भी सदा अकेला
 चलना ही सुहाता है मुझे

वो पारखी नजर लाऊं कहां से मैं,
जो समझ सके इन्सानों को।

उमिदे ईश्वर से करनी चाहिए इन्सान से नहीं
चंद लोग ही अच्छे होते हैं,और सच्चे भी,
अब तो जो मुंह पर अच्छा बोलते हैं
कैसे समझूं की सच्चा बोलते हैं वो
गुरू ही मार्गदर्शक हुआ करते थे कभी
अब तो गुरू और उनके शिष्य
दोनों ही पथभ्रष्ट हुआ करते हैं

वो पारखी नजर लाऊं कहां से मैं,
जो समझ सके इन्सानों को।

जब तक मतलब है तब तक,
पहचानते हैं और जानतें हैं हमें,
ये सोच किसी धर्म की नहीं
न ही किसी जाति की है
 किसी गरीब या अमीर की है
 अब समय है कि सबको यह
 होगा समझना कि कोई नासमझ
 न समझे तुम्हें, वो पारखी नजर
  लानी है तुम्हें जो समझ सके इन्सानों को।
 
वो पारखी नजर लाऊं कहां से मैं,
जो समझ सके इन्सानों को।

Meri Nazar Se......

No comments:

Post a Comment