Sunday, 19 January 2020

एग्जाम के दिनों में बच्चों की मनोदशा
मैं अपने अनुभव व अपनी सोच से कुछ ऐसी चीजें बताने जा रही हूं, जिससे बच्चों उत्साहवर्धन  होगा और हम बड़ों को भी एक खुशी मिलेगी। अपने बच्चों के भविष्य को उज्जवल कर उन्हें आगे लेकर जाने में। इस पर मैं कुछ आर्टिकल्स लिखने वाली हूं मुझे उम्मीद है कहीं ना कहीं यह बच्चों का उत्साहवर्धन अवश्य करेंगे और अभिवावकों को भी एक दिशानिर्देश देगें।
आर्टिकल 1
 हमें बच्चों को  समझना चाहिए-:
हम बड़ों का सबसे पहला कर्तव्य है कि हमें बच्चों को समझना बहुत आवश्यक है। आज के बच्चे बहुत ही बेहतरीन हैं । हमें केवल उनके विचारों को और उनके मनोभावों को समझना अत्यावश्यक है । हमें ऐसे नियम नहीं बनाने चाहिए या उन पर नहीं थोकने चाहिए जो अनावश्यक है। हमारा कर्तव्य केवल इतना ही है कि हम उन्हें एक सही दिशा दिखा सके पर उस दिशा पर चलने के लिए हम जो भी नियम उनके लिए बनाते हैं हमें उनके साथ खड़े होना चाहिए ।यह हमारा कर्तव्य है कि हम उन्हें सही रास्ता व नियम बताएं। यदि हम ऐसा नहीं कर पाते हैं तो हमें बार-बार यह नहीं बताना चाहिए कि यह गलतियां उनकी हैं वह सही रास्ते पर नहीं चल पा रहे क्योंकि जो रास्ता हमने उन्हें दिखाया क्या हमने उस रास्ते पर चलने के लिए उनका साथ दिया यदि नहीं दिया तो यह हमारी भी गलती है हमें यह समझना चाहिए कि यदि हम जो भी नियम बनाते हैं वह नियम वास्तविक्ता में बच्चों के हित में है या नहीं दूसरा यदि उस नियम को लागू करने में थोड़ा सा बदलाव करना पड़े तो हमें अवश्य करना चाहिए क्योंकि समय और परिस्थितियों के हिसाब से नियम बनते हैं नियम कोई पत्थर की लकीर नहीं होती कि हमने बना दिया और बच्चों को उस पर चलना ही है नियम ऐसे होने चाहिए जो अच्छे हो और परिस्थितियों के अनुसार उसमें थोड़ा फेरबदल रखने की संभावना अवश्य होनी चाहिए सबसे महत्वपूर्ण की क्या हम स्वयं एक अच्छे इंसान बन पा रहे हैं या क्या हम जो   उनके साथ कर रहे हैं उचित रूप से कर रहे हैं या नहीं ।हम जो  दंड उन्हें देते हैं वह मानवीय है या अमानवीय उनके लिए जो हम परिस्थितियां दे रहे हैं क्या वह सही परिस्थितियां हैं इन सबको हमें समझना होगा तभी हम उन रास्तों पर चलने के लिए उन्हें बाध्य कर सकते हैं और परिस्थितियां जो हमने उन्हें दी हैं वह सही नहीं हैं तो हमने स्वयं अपना कर्तव्य सही नहीं निभाया है  उसके लिए बच्चे दोषी नहीं है इसलिए सबसे पहले जो बड़े लोग हैं उन्हें आत्ममंथन करना है कि वह बच्चों के योग्य बन पाए।
पहले हमें स्वयं को सही करना होगा तो बच्चे स्वयं ही उन सही रास्तों पर चलने लगेंगे।
Meri Nazar Se......

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